जानिए राम की नही रावण की पूजा करनी चाहिए

Hi दोस्तो आपलोग निश्चित ही राम और रावन का नाम सुना ही होगा आप TV पर देखे होंगे किताबो मे पढ़े होगे या अपने माता-पिता दादा-दादी से राम-रावण कि कहानिया सुनी ही होगी । हिन्दू धर्म मे राम को भगवान माना जाता है दूसरी ओर रावण को शैतान । हिन्दुओ चौक-चौड़ाहो , घरो मे राम कि प्रतिमा को रखते है पूजा किया करते  है मतलब साफ-साफ है हिन्दूओ के दिल मे राम ही राम है, और रावण के लिए आपके दिल मे घृणा ही होगी ऐसा अगर आपके दिल मे रावण के लिए नफरत है तो जरूर ये Article पढ़े । चलिए एक बात पुछ रहे है आपसे यदि कोई कहे राम कि नही रावण का पूजा करो तो आपको कैसा लगेगा आप जरूर ही उस शख्स की पिटाई कर दोगे, एक ऐसा ही कहने वाले महान अध्यात्मिक गुरू कि कही गई बात जिनके अरबो-खरबो हिन्दू भक्त थे शायद आप भी जानते होंगे नही जानते है तो जान जाएगे, अध्यात्मिक गुरू का नाम हम Article के अंत मे बता देगे पहले उनकी कही गई बातो का जिक्र करते है शायद आपको भी लगे अध्यात्मिक गुरू  सच्ची वर्णन किया या गलत, जानेंगे तो आपके दिल मे जितनी राम के लिए प्रेम है उससे ज्यादा रावण से भी प्रेम हो जा सकता है । आचार्य अध्यात्मिक गुरू उनका कहना था राम कि नही रावण का पूजा करो क्योंकि राम धूर्त, गद्दार, मक्कार, धोखेबाज  है । अध्यात्मिक गूरू अपने विचार भक्तो को कुछ इस प्रकार पेश कि है- राम से रावण की कोई शत्रुता नही थी राम अपने कार्य मे व्यस्थ था और रावन अपने कार्य मे व्यस्थ था । दोनो मे से शत्रुता करने कि शुरूआत  किसने कि राम ने पहले किया या रावण ने किया? आपलोगो जानते होगे रावण ने सिता को अपहरण करके लंका ले गया था यही से शत्रुता कि शुरुआत हुआ था मगर यहां से शत्रुता कि शुरूआत नही हुई थी ये तो बहुत बाद

Hindi story of ramayan
जानिए राम कि नही रावण की पूजा करो किसने कहा? क्यो कहा?

कि घटना है । राम ने रावण से छल करके दुश्मनी कि शुरुआत सबसे पहले ही कर दिया था, बात उन दिनो कि थी जनकपुर मे राजा जनक अपनी बेटी सीता के शादी के लिए स्वयंम्बर का ऐलान किया और सभी राजाओ को निमंत्रण भेजा था उनमे से रावण को भी निमंत्रण मिला था रावण भी उस स्वयंम्बर मे उपस्थित था, राम-लक्ष्मण केवल अपने गुरू विश्वामित्र जी के साथ आये थे क्योंकि जनक जी ने विश्वामित्र जी को निमंत्रण दिया था उस समय आपको पता ही होगा राम-लक्ष्मण विश्वामित्र जी के साथ रहने का कारण था विश्वामित्र जी जब भी यज्ञ किया करते थे तो राक्षस यज्ञ मे विघ्न डाला करता था राक्षसो से निजात पाने के लिए राम-लक्ष्मण को अपने साथ रखा करते थे। सीता का स्वयंम्बर शुरू हुआ सीता से विवाह धनुष तोड़ने वाला राजा से होना था, धनुष मामुली नही था शिवशंकर भोलेनाथ जी का धनूष था उस स्वयंम्बर मे एक रावण ही था जो भोलेनाथ के परम भक्त थे अगर वो स्वयंम्बर मे रहता तो धनुष आसानी से तोड़ देता रावण से ही सीता का विवाह हो जाता परंतु स्वयंम्बर सभा मे रावण का नंबर आने से पहले एक गुप्तचर रावण को सुचना देता है कि आपका लंका मे भयानक आग लग गई है। आपलोगो को पता ही होगा रावन ने अपने भगवान महादेव के रहने के लिए सोने कि लंका बनवाई थी मगर रावन को सोने कि लंका बनकर तैयार हुआ तो उसे खुबसूरत लगा और फिर महादेव से मांग ली थी रावण को अपने सोने कि लंका से बहुत प्रेम था जब गुप्तचर ने लंका मे आग लगने कि बात रावन से कही तो रावण को ख्याल ही नही रहा कि धनुष तोड़ने कि नंबर तक रहे, वो भागा-भागा लंका आ गया यहां लंका मे रावण देखा कही भी आग नही लगी है वो फिर लंका से जनकपुर सीता के स्वंयम्बर मे गया जब तक वो गया सीता का स्वयंम्बर समाप्त हो चुकी थी सीता का विवाह राम के साथ हो चुकी थी। वो गुप्तचर कोई और नही था जिसने रावण को लंका मे आग लगने कि बात कही थी वो राम कि सोची-समझी साजिश थी रावण ज्ञानी था वो समझ भी गया था फिर भी अपने मन को शांत किए लंका वापस हो गया । राम के द्वारा "छल" मिलने बाद भी रावण के दिल मे राम के प्रति दुश्मनी नही जगी थी, रावण विद्वान था शिव का परम भक्त था उसके पास अनेक प्रकार कि शक्तिया थी रावण जानता था विष्णु कि अवतार ही राम है, रावण समझता था राम किसी के साथ गलत नही कर सकता है क्योंकि राम विष्णु का रूप है। समय बितता गया राम ने दुसरी बार फिर रावण से दुश्मनी कि चाल चल दी जब रावण कि बहन शूर्पणखा कि नाक-कान लक्ष्मण से कटवा दिया राम चाहता तो लक्ष्मण को रोक सकता था परंतु लक्ष्मण को रोका नही अपने सामने लक्ष्मण को ऐसा करने दिया। जब अपनी बहन के साथ राम के द्वारा कि गई व्यवहार रावण को पता चली तो इस बार रावण गुस्साए सीता का अपहरण कर के अपने अशोक वाटिका जो कि रावण का प्रिय सुन्दर बगीचा था सीता को बीना जंजीरो के उस बगीचा मे रख दिया रावण चाहता तो सीता को लोहे कि सलाखो मे जंजीरो से बांध कर भी रख सकता था जो चाहता वैसा भी रावण सीता के साथ कर सकता था मगर रावण सीता के साथ गलत हरकत नही किया जब भी रावण सीता से कुछ कहता भी था तो दूर से ही कहता था। तीसरी गलती- राम ने "कपट" किया जब विभीषण को लंका कि राजा बनाने कि लालच देकर रावण कि राज जाना रावण कि प्राण नाभी मे है रावण को मार गीराया वरणा राम से रावण कभी परास्त नही होता राम कि हार निश्चित थी। चौथी गलती राम ने फिर तब किया जब सीता को पवित्रता कि अग्नि परीक्षा करवा दिया । दोस्तो जरा आप ही लोग सोचिए हमलोग राम को भगवान मानते है यदि भगवान को ही अपनी पत्नी पे संदेह करे तो आज के मानव क्या-क्या संदेह अपने पत्नीयो पर कर सकता है। अब थोड़ा राम का भाई भरत का भी बात कर लेते है जिन्होंने राम के अनुपस्थित मे केवल राम के चप्पल सिहांसन पर रख के राम का चप्पल का पूजा किया राम अपने भाई का भी नही हुआ राज्य मे लौटते ही सिंहासन पर बैठ गया यहां पर भी राजगद्दी का मोह राम ने साफ-साफ दिखाया। पांचवी गलती राम ने फिर से करके दर्शा दिया तब जब एक धोबी सीता के पवित्रता पर कानाफूसी के बात पर सीता को राज्य से बाहर निकाल दिया राम जानता था सीता पवित्र है फिर भी खूद के सम्मान पाने हेतू एक स्त्री का सम्मान नही किया एक स्त्री का साथ देने के बजाय उनलोगो कि बात मानी जो लोग सीता के विषय मे गलत अफवाहे उड़ा रहे थे आखिर जनता के बीच मे महान महान जो कहलाना था, एक धोबी के बात पर सीता को राज्य से बाहर निकाल दिया सीता की एक बात भी नही सुनी अगर सबसे ज्यादा सीता को बार-बार  कोई अपमान किया तो वो राम ने ही किया यहा पर राम को चाहिए था सीता के साथ ही राज्य त्याग देनी चाहिए थी परंतु राम को तो राज्य का लोभ सर्वोपरि था.! Dosto आपलोगो को कैसी लगी राम रावण के संबंध और राम रावण का व्यवहार Comment box मे Comment कर के बताए । एक बात आपको बताना भूल गया ये Article मे मेरे विचार पेश नही है ये आचार्य रजनीश जिन्हे अध्यात्मिक गूरू ओशो की नाम से जाने जाते है उन्ही के द्वारा राम-रावण कि तुलना कि गई है । दोस्तो Next Time और Story पढना चाहते है तो निचे अपना Email डालकर Subscribe जरूर कर ले ..!

                         जय हिंद जय भारत 
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